?

Log in

Swati Sani
swatisani
..::. .::.
Back Viewing 0 - 10  

दिलों को पिरोने वाला अब वो तागा नहीं मिलता
रिश्तों में नमीं प्यार में सहारा नहीं मिलता

यूँ ही बैठे रहो, चुप रहो, कुछ न कहो
लोग मिल जातें हैं दोस्ती का इशारा नहीं मिलता

रेत बंद हाथों से फिसलती जाती है
वक्त जो टल जाता है दोबारा नहीं मिलता

डूब जाने दो दरियाओं में मुझे ऐ हमदम
अब वो सुकून भरा किनारा नहीं मिलता

 

Originally published at Swati Sani. Please leave any comments there.

पुराने पन्नों वाली
वो डायरी
अक्सर ज़िन्दा हो जाती है,
जब खुलती है

मुस्कुराती है,
पहले प्यार की हरारत
खिलखिलाती है
कर के खुछ शरारत

रुलाती भी है
वो एक कविता
एक सूखा ग़ुलाब
कुछ आँसुओं से मिटे शब्द…

कुछ  मीठी,
कुछ नमकीन सी यादें
निकल आतीं हैं जब
बिखरे पीले पन्नों से

मैं भूल जाती हूँ
इस उम्र की दोपहर को
और फिर से जी लेती हूँ
कुछ अनमोल पल.

Originally published at Swati Sani. Please leave any comments there.

रास्ता तो दिखता है....

रास्ता तो दिखता है....

कुछ नज़र नहीं आता
बहुत धुंद है, ठंड़ है,  कोहरा है यहाँ
रास्ता तो दिखता है
मगर क्या यहीं मुझे चलना है?
आगे बढ़ना है? या ठहर जाना है?
क्या कोई पगडंडी कहीं जुड़ती है?
या कोई राह निकलती है कहीं?

बहुत धुंद है, ठंड़ है,  कोहरा है यहाँ
कुछ भी नज़र नहीं आता
मेरी मंज़िल कहाँ है?
है भी या नहीं?
जो मैने देखी थी
क्या वो थी एक मरीचिका?
क्या मेरी लालसा अनंत है?

मेरा गंतव्य है कोई?
या इन धुंद भरी अकेली राहों पर
यूँ ही भटकना है मुझे
मगर…
कब तक?
कहाँ तक?
कुछ भी तो नज़र नहीं आता!

Originally published at Swati Sani. Please leave any comments there.

January 1, 2012

जब से तुम आये हो
ऐ नये साल
धूप कहीं खो सी गयी है
सुर्ख गुलाब के इंतज़ार की आस भी
अब खत्म हो गयी है

सितारे दूर नील गगन में
धरती को तकते
चाँद उदास
बेताब बादलों परे
बिल्कुल अकेला

ऐ नये साल
इस बरस तुम
कितने फीके हो
सतरंगी, पचरंगी वेश छोड
क्यों धूसर बने, कहो?

Originally published at Swati Sani. Please leave any comments there.

Reflections

January 1, 2012: Reflections.

ऐ नये साल बता, तुझ में नयापन क्या है
हर तरफ ख़ल्क ने क्यों शोर मचा रखा है

रौशनी दिन की वही, तारों भरी रात वही
आज हमको नज़र आती है हर बात वही

आसमां बढ़ा है अफसोस, ना बढ़ी है जमीं
एक हिन्दसे का बढ़ना कोई जिद्दत तो नहीं

अगले बरसों की तरह होंगे करीने तेरे
किसे मालूम नहीं बारह महीने तेरे

जनवरी, फरवरी और मार्च में पड़ेगी सर्दी
और अप्रैल, मई, जून में होवेगी गर्मी

तेरे मान-दहार में कुछ खोएगा कुछ पाएगा
अपनी मय्यत बसर करके चला जाएगा

तू नया है तो दिखा सुबह नयी, शाम नई
वरना इन आंखों ने देखे हैं नए साल कई

बेसबब देते हैं क्यों लोग मुबारक बादें
गालिबन भूल गए वक्त की कडवी यादें

तेरी आमद से घटी उमर जहां में सभी की
फैज नयी लिखी है यह नज्म निराले ढब की

– फैज़ अहमद फैज़*

* The book Saare Sukhan Hamare (complete works of Faiz) that I have does not list this ghazal. However, at several independent places on the net I found this ghazal attributed to Faiz Ahmed Faiz. Comments/views on this invited.

Originally published at Swati Sani. Please leave any comments there.

This ghazal of Faiz Ahmed Faiz is beyond translation but I am attempting it nevertheless. The poem is a statement of politics and struggle of his times.

न गवाओं नावके-नीमकश, दिले रेज़ा रेज़ा गवाँ दिया
जो बचे हैं संग समेट लो, तने दाग़ दाग़ लुटा दिया

मेरे चारगर को नवेद हो सफे दुशमनों को खबर करो
जो वो कर्ज़ रखते थे जान पर वो हिसाब आज चका दिया

करो कज़ ज़बीं पे सरे कफन मेरे कातिलों को गुमां न हो
कि गुरूरे इश्क का बाँकपन पसे मर्ग हमने भुला दिया

उधर एक हर्फ की कुश्तनी यहाँ लाख उज्र था गुफ्तनी
जो कहा तो सुनके उड़ा दिया जो लिखा तो पढ़ के मिटा दिया

जो रुके तो कोहे गराँ थे हम जो चले तो जाँ से गुज़र गये
रहे यार हमने कदम कदम तुझे याद ग़ार बना दिया

-फैज़ अहमद फैज़

Do not waste your (half drawn) arrows, my broken heart is already lost
Save the left over stones, my body is already wounded and wasted

Give the good news to my healer, let the rows of my enemy know
He whose soul was indebted,  has settled all his debt today

Keep the shroud on my head today, my murders should not have any misgivings
that I forgot the pride of being in love on my way to death (or after death)

They had just one word, and I had lakhs to explain as excuses (of my deeds)
When I told (you) did not pay attention, when I wrote, (you) read and erased them

When I stopped, I was a like a mountain, when I walked, I walked past life itself
Every step of the path I tread I have made a memorial of my beloved.

Originally published at Swati Sani. Please leave any comments there.

मरीचिका

हर तूफान के बाद

लहलहने लगती है सुहाने सपनों सी

बुलाने लगती है पास, और पास अपने

पाँव निर्थरक ही बढ़ उठते हैं उस ओर

पर वह परे हटती जाती है

और खो जाती है

रेत के एक और अंधड में

फिर कभी किसी तूफान के बाद

आस दिलाने के लिये

Originally published at Swati Sani. Please leave any comments there.

This is a poem by Maya Angelou that I *had* to record on my blog. Rarely does one gets to read expressions like these.

 

You may write me down in history
With your bitter, twisted lies,
You may trod me in the very dirt
But still, like dust, I’ll rise.

Does my sassiness upset you?
Why are you beset with gloom?
‘Cause I walk like I’ve got oil wells
Pumping in my living room.

Just like moons and like suns,
With the certainty of tides,
Just like hopes springing high,
Still I’ll rise.

Did you want to see me broken?
Bowed head and lowered eyes?
Shoulders falling down like teardrops.
Weakened by my soulful cries.

Does my haughtiness offend you?
Don’t you take it awful hard
‘Cause I laugh like I’ve got gold mines
Diggin’ in my own back yard.

You may shoot me with your words,
You may cut me with your eyes,
You may kill me with your hatefulness,
But still, like air, I’ll rise.

Does my sexiness upset you?
Does it come as a surprise
That I dance like I’ve got diamonds
At the meeting of my thighs?

Out of the huts of history’s shame
I rise
Up from a past that’s rooted in pain
I rise
I’m a black ocean, leaping and wide,
Welling and swelling I bear in the tide.
Leaving behind nights of terror and fear
I rise
Into a daybreak that’s wondrously clear
I rise
Bringing the gifts that my ancestors gave,
I am the dream and the hope of the slave.

I rise
I rise
I rise.

 

—Maya Angelou

 

Originally published at Swati Sani. Please leave any comments there.

मिथ्या
घुंघरू के मध्यम बोलों ने
कुछ कहा फुसफुसाकर
गुनगुनाकर फिर होठों ने
हौले हौले माहौल बनाया
और तुम्हारी आँखों की गहराइयों में
मैने अपने आप को
डूबते, उतराते, मदमाते पाया

जाने कब हुयी सुबह
सूर्य किरण ने घटाओं से झांक कर देखा
घुंघरू के बोलों का तीव्रतर हो थम जाना
होठों पर छिडे तरानों का कंठ ही में घुल जाना
आँखों की विशाल गहराई का
पलकों के भीतर छुप जाना
और टूटना एक स्वपन का

Originally published at Swati Sani. Please leave any comments there.

Bahadur Shah Zafar, the last Mughal king was also a poet. Though his literary standing was not as high as as his Ustad (Mohd. Ibhrahim Zauk) or his contemporaries Ghalib and Momin; his writings are much respected and appreciated. Zafar was a king (though in British raaj his kingdom did not extend beyond the red fort) and a freedom fighter.

This ghazal is one of his finest works specially when you read it in context to India’s freedom struggle and a helpless (and impotent when it came to doing anything for his country and men) king’s sentiments.

या मुझे अफसरे शाहा न बनाया होता
या मेरा ताज गदाया न बनाया होता

खाकसारी के लिए गरचे बनाया था मुझे
काश संगे-दरे-जाना न बनाया होता

नशा-ए-इश्क का गर ज़र्फ दिया था मुझको
उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता

रोज़ मामूरा-ए-दुनिया में खराबी है ‘जफर’
ऐसी बस्ती से तो वीराना बनाया होता

अफसरे शाहा – शहंशाह
गदाया – भीख में मिला हुआ
खाकसारी – नम्रता, politeness
संगे-दरे-जाना – महबूब के दरवाज़े का पत्थर
ज़र्फ – योग्यता
तंग -छोटा, पैमाना – नाप actual meaning of paimana is wine goblet
मामूरा – शहर

Originally published at Swati Sani. Please leave any comments there.

Back Viewing 0 - 10